हर दिन आप सोशल मीडिया खोलते हैं…
कहीं 5–6 साल का बच्चा मेकअप ट्यूटोरियल दे रहा है,
कहीं 12 साल का लड़का रोस्ट बना रहा है,
कहीं पूरा परिवार बच्चों की हर हँसी, हर रोने की क्लिप को “क्यूट कंटेंट” कहकर अपलोड कर रहा है।
जो चीज़ ऊपर से मासूम और प्यारी लगती है, उसके पीछे धीरे–धीरे एक नई दुनिया बन रही है—
‘Child Content Factory’
जहाँ बचपन, पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य सबकुछ कंटेंट, व्यूज़ और ब्रांड-डील्स की रेस में खो जाता है।
इस आर्टिकल में उसी छुपी हुई परत को खोला गया है।
⭐ भारत में Under-18 Influencers कितने और कौन?
भारत में पिछले 3–4 सालों में किड इन्फ्लुएंसर का ट्रेंड तेज़ी से exploded हुआ है।
इनमें शामिल बच्चे:
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फैशन और मेकअप वीडियो बनाते हैं
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डांस, लिप-सिंक और चैलेंज कॉन्टेंट
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पारिवारिक व्लॉग्स और प्रैंक
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गेमिंग, मोटिवेशनल बाते
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और ब्रांडेड शूट्स व स्पॉन्सर वीडियो
अक्सर ये सब बच्चा खुद नहीं, बल्कि माता-पिता, मैनेजर या एजेंसियाँ चलाती हैं।
जो दिखता है वो “प्यारा टैलेंट” होता है…
जो नहीं दिखता, वो होता है एल्गोरिद्म और ब्रांड डील्स की मशीन।
🏭 ‘Child Content Factory’ कैसे काम करती है?
इसे चार स्तंभ चलाते हैं:
1️⃣ एल्गोरिद्म का प्रेशर
सोशल मीडिया को सबसे ज़्यादा एंगेजमेंट मिलता है:
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क्यूट बच्चा
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भावनात्मक म्यूज़िक
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इमोशनल फैमिली सीन्स
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क्रिंजी पर “watchable” कंटेंट
एक वीडियो चलता है → दूसरा बनाने का प्रेशर आता है → नियमित शूट शुरू → बच्चा धीरे-धीरे कॉन्टेंट मशीन बन जाता है।
2️⃣ ब्रांड्स की भूख
किड्सवेअर, टॉयज़, चॉकलेट, लर्निंग ऐप्स—सबको चाहिए:
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मासूम चेहरा
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फैमिली-फ्रेंडली सेटअप
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“रियलिस्टिक” इमोशनल वीडियो
कई फैमिली चैनल पूरे महीने का कैलेंडर बनाकर शूट करते हैं —
ये घर कम और स्टूडियो ज़्यादा बन जाता है।
3️⃣ माता-पिता की उम्मीदें
कई पैरेंट्स सोचते हैं:
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“हम बच्चे का टैलेंट दिखा रहे हैं।”
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“व्यूज़ आ रहे हैं—फायदा ही फायदा।”
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“ये तो बस एक वीडियो है।”
लेकिन धीरे-धीरे:
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रोज़ कंटेंट बनवाना
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बार-बार रीटेक
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स्कूल से आते ही कैमरा
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बच्चे को गिफ्ट या डांट देकर शूट करवाना
ये सब मिलकर उसे प्रॉप (सामान) बना देता है, इंसान नहीं।
4️⃣ दर्शक (Audience) का रोल
हम हर क्यूट वीडियो को लाइक करके आगे बढ़ जाते हैं।
पर शायद समझ नहीं पाते कि ये लाइक और शेयर बच्चों को एक ऐसे ट्रेंड में धकेल रहे हैं, जहाँ:
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प्राइवेसी खत्म
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पढ़ाई को नुकसान
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मानसिक थकान
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गलत कमेंट्स और ट्रोलिंग
सब जल्दी शुरू हो जाता है।
🎒 स्कूल से स्टूडियो: रील बनाने की पागल दौड़
अब बच्चा सिर्फ घर में नहीं—
स्कूल, यूनिफॉर्म, क्लासरूम भी कंटेंट का हिस्सा बन चुके हैं।
हाल के महीनों में भारत के कई राज्यों में:
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क्लासरूम में रील शूट
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टीचर्स द्वारा बच्चों से वीडियो बनवाना
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वायरल होने के लिए एक्टिंग करवाना
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स्कूल में “क्यूट कपल” या “फनी व्लॉग” जैसे वीडियो
ये सब घटनाएँ लगातार सामने आई हैं।
ये ट्रेंड बताता है कि रील बनाना अब एक प्रेशर बन गया है—
जहाँ बच्चे के हर पल को कंटेंट समझ लिया जाता है।
🧠 Mental Impact: लाइक्स की दौड़ में बच्चे अंदर से टूट रहे हैं
सोशल मीडिया पर एक्टिव बच्चों में आमतौर पर देखा गया है कि उन्हें:
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Anxiety (बेचैनी)
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Comparison Stress
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Self-esteem Issues
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नींद की गड़बड़ी
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Constant Performance Pressure
का सामना करना पड़ता है।
कमेंट सेक्शन में लोग:
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शरीर
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कपड़ों
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डांस
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चेहरे
पर जो भी उल्टा-सीधा लिख दें…
उसका असर एक छोटे दिमाग़ पर बहुत गहरा होता है।
⚖️ कानून क्या कहता है? भारत में सबसे बड़ा ‘लीगल गैप’
भारत में अभी Child Influencers पर सीधा कानून नहीं है।
हाँ, इनसे जुड़ी विभिन्न गाइडलाइन और एक्ट हैं:
1️⃣ NCPCR (बाल अधिकार आयोग) के सिद्धांत
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बच्चे के काम के घंटे तय
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उसकी privacy का अधिकार
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उसे हानिकारक कंटेंट से बचाना
लेकिन ये सब टीवी/फिल्म पर फोकस करते हैं…
सोशल मीडिया को इनमें कवर ही नहीं किया गया।
2️⃣ डेटा प्रोटेक्शन कानून
नए डिजिटल प्राइवेसी नियमों में कहा गया है कि:
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नाबालिगों के अकाउंट पर माता-पिता की अनुमति ज़रूरी
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प्लेटफॉर्म्स को बच्चों के डेटा की extra सुरक्षा देनी चाहिए
अगर ये नियम कड़ाई से लागू हों,
तो आधे से ज़्यादा Child Influencer अकाउंट्स सवालों में आ जाएंगे।
3️⃣ Child Labour & POCSO
अगर बच्चा नियमित “कमर्शियल कंटेंट” कर रहा है,
तो ये Child Labour के रूप में भी देखा जा सकता है।
कई मामलों में छोटे बच्चों से:
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इंडिसेंट डांस
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उम्र से बड़े मेकअप
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suggestive वीडियो
बनवाना POCSO या JJ Act के दायरे में भी आ सकता है।
🌍 दुनिया Child Influencers पर कैसे नकेल कस रही है?
फ्रांस का मॉडल (सबसे सख़्त)
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16 से कम उम्र के बच्चों के वीडियो पर Child Labour कानून लागू
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बच्चे की कमाई का बड़ा हिस्सा ट्रस्ट फंड में डालना अनिवार्य
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पेरेंट्स को काम का “ऑथराइजेशन” लेकर ही वीडियो बनाना होगा
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बच्चे को 18 की उम्र पर अधिकार:
“मेरे सभी वीडियो डिलीट करो”
भारत में ऐसा कोई ठोस कानून अभी मौजूद नहीं।
💰 बच्चे ‘Currency’ बन रहे हैं – असली खतरा यहीं है
कई केस सामने आ चुके हैं जहाँ:
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पेरेंट्स ने बच्चे की कमाई खुद खर्च की
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ब्रांड डील्स के लिए बच्चा घंटों शूट करता रहा
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बच्चे की पढ़ाई गिर गई
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बच्चा सबके सामने “मज़ाक/ड्रामा” का करैक्टर बन गया
ये सब भावनात्मक या आर्थिक शोषण के रूप में भी देखा जा सकता है।
📲 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स: प्रॉफिट ज्यादा, प्रोटेक्शन कम
आज की हकीकत:
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बच्चों का कंटेंट सबसे ज्यादा एंगेजमेंट देता है
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लेकिन प्लैटफ़ॉर्म्स के पास बच्चों की सुरक्षा के लिए
अभी भी एक मजबूत, स्पष्ट, पारदर्शी सिस्टम नहीं है
जरूरत है:
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Child Influencers के लिए स्पेशल वेरिफिकेशन
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Age-safe कंटेंट फ़िल्टर
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“Child Commercial Content” टैग
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रिपोर्टिंग और मॉनिटरिंग के सख्त टूल्स
👨👩👧 आपके लिए क्या सीख? (Parents + Teachers + Viewers)
अगर आप माता-पिता हैं
रेड फ्लैग्स:
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बच्चा हर वक्त लाइक / फॉलोअर्स गिन रहा हो
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पढ़ाई से ज्यादा “रील आइडिया” में दिमाग लगे
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हर खुशी–रोना–नाराज़गी कैमरे में कैद हो
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बच्चा थक चुका हो लेकिन “फिर से शूट” बोले
अगर आप Viewer हैं
कभी-कभी लाइक दबाना भी समस्या को बढ़ाता है।
अगर आपको ऐसा कंटेंट दिखे जिसमें बच्चा असहज, मजबूर या sexualized लगे—
तो उसे रिपोर्ट करना ही सही कदम है।
🧩 भारत को आगे क्या करना चाहिए?
✔ Child Influencers के लिए एक पक्का कानून
– Registration
– Work-hour limits
– Age-appropriate guidelines
✔ बच्चे की कमाई ट्रस्ट में लॉक
– फ्रांस मॉडल जैसा कानून
✔ “Right to Delete Childhood”
– 18 की उम्र पर बच्चे को अधिकार कि वो सारी पुरानी पोस्ट हटवा सके
✔ स्कूलों में No-Reels पॉलिसी
– क्लासरूम में सोशल मीडिया शूटिंग पर पूरी तरह रोक
✔ Parent Awareness Campaign
– “हर पल सार्वजनिक नहीं होना चाहिए”
– “बच्चे की प्राइवेसी भी उसकी इज़्ज़त है”
❤️ आख़िरी बात: बचपन—कॉन्टेंट नहीं, एक बार मिलने वाला दौर है
बच्चों में टैलेंट होता है, रचनात्मकता होती है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब:
“टैलेंट → टारगेट”
“क्यूटनेस → प्रॉफिट”
“परिवार → ब्रांड”
और
“बच्चा → कंटेंट फैक्ट्री का प्रोडक्ट”
बन जाता है।
अगर हम सच में बच्चों से प्यार करते हैं,
तो हमें तय करना होगा:
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कौन सा पल ऑफ़लाइन ही अच्छा है
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कौन सा कंटेंट सुरक्षित नहीं है
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और कहाँ “क्यूटनेस” के नाम पर exploitation शुरू हो गया है।
