चतुर्भुज स्थान का इतिहास: मंदिर से प्रारंभ
हर शहर की गहराई में कुछ रहस्य छुपे होते हैं। मुजफ्फरपुर का चतुर्भुज स्थान भी ऐसा ही एक रहस्यमयी मोहल्ला है। दिन के उजाले में यह किसी आम बाजार की तरह लगता है, लेकिन जैसे ही सूरज ढलता है, इसकी असली पहचान उजागर होती है।
700 साल पुराना मंदिर और चार भुजाओं वाले भगवान
मुजफ्फरपुर जंक्शन से केवल 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चतुर्भुज स्थान का प्रारंभ चतुर्भुज स्थान मंदिर से हुआ। लगभग 700 साल पहले, तुर्की गांव में जमीन से चार भुजाओं वाले भगवान की मूर्ति प्रकट हुई। बाबा ने इस मूर्ति को उठाकर लगभग 20 कोस की दूरी पैदल तय की और इसे वर्तमान शिव मंदिर में स्थापित किया।
इस मूर्ति की स्थापना के बाद, मंदिर में सालाना मेला शुरू हुआ। दूर-दराज के लोग संतान प्राप्ति और मन्नत के लिए यहां आने लगे। धीरे-धीरे मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ी और स्थानीय जमींदारों ने भी इसे अपने संरक्षण में लिया।
मन्नत, मेला और कीर्तन की परंपरा
मंदिर में हर साल कीर्तन और भजन आयोजित होने लगे। चार भुजाओं वाले भगवान के कारण इसे चतुर्भुज स्थान कहा जाने लगा। यह जगह धीरे-धीरे संगीत और कला का केंद्र बन गई। अंग्रेजों के समय में यहां कीर्तन की मंडलियों में स्थानीय जमींदारों ने भी इनाम देना शुरू किया।
कला और संगीत का सुनहरा दौर
चतुर्भुज स्थान का संगीत और कला में योगदान अपार था। यहाँ की तवाइफें और कलाकार अपनी अदाओं और गायन की वजह से दूर-दराज प्रसिद्ध हुए।
पन्नाबाई और गायकी की परंपरा
पन्नाबाई नामक कलाकार ने सोसाइटी गायकी की विधा की शुरुआत की। उनकी महफिलों में दूर-दराज के लोग आते थे। उनकी शर्तें भी स्पष्ट थीं – जब तक वह गा रही हों, कोई बीच में न उठे। इस तरह, चतुर्भुज स्थान में गायकी और संगीत की परंपरा पनपी और पूरे मुजफ्फरपुर में फैल गई।
शरद चंद्र और उपन्यासों में चतुर्भुज स्थान
मुजफ्फरपुर आए लेखक शरद चंद्र ने चतुर्भुज स्थान की गायिकाओं और तवाइफों को अपने उपन्यासों में अमर कर दिया। उनकी किताब श्रीकांत और देवदास में इन महिलाओं के किरदारों का आधार माना जाता है। इस तरह, चतुर्भुज स्थान का सांस्कृतिक प्रभाव साहित्य में भी दिखाई देता है।
बदलाव और पतन की शुरुआत
सभी सुनहरी कहानियों की तरह चतुर्भुज स्थान की भी एक कड़वी वास्तविकता आई।
इमरजेंसी और महफिलों पर पाबंदी
जब देश में इमरजेंसी लागू हुई, तो महफिलों पर पाबंदी लगी। दूरदराज जाकर प्रदर्शन करने पर रोक लगी और महिलाओं को व्यवसाय के अन्य धंधों में फंसाया गया। इससे यहां के बच्चों और युवाओं पर भी असर पड़ा। स्कूलों में बच्चों का दाखिला मुश्किल हो गया और कई माता-पिता ने गलत एड्रेस दिया।
तवाइफों और बच्चों के जीवन पर असर
चतुर्भुज स्थान की लड़कियों और महिलाओं को न केवल सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, बल्कि उनका जीवन भी खतरे में पड़ा। कई बच्चों को पढ़ाई से वंचित रखा गया। इस कठिन समय में, बाबू जयप्रकाश नारायण ने 1970 में लड़कियों के लिए विशेष स्कूल खोला, ताकि उन्हें शिक्षा मिल सके।
आधुनिक युग की कड़वी सच्चाई
आज चतुर्भुज स्थान एक रेड लाइट एरिया के रूप में जाना जाता है।
रेड लाइट एरिया में बदलता मोहल्ला
अनुमान है कि यहां लगभग 3500 सेक्स वर्कर्स रहती हैं। साल 2004 में पुलिस ने छापा मारा और करीब 200 लड़कियों को गिरफ्तार किया, जिनमें कई नाबालिग थीं। नीना श्रीवास्तव ने इन लड़कियों की सच्चाई जुगनू पत्रिका में प्रकाशित की।
ऑपरेशन उजाला और सामाजिक सुधार के प्रयास
बिहार की महिलाओं के कल्याण के लिए ऑपरेशन उजाला शुरू किया गया। इसका उद्देश्य था बेसहारा महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना और उन्हें मुख्यधारा में लाना। चतुर्भुज स्थान की सरला और बेगम जैसी महिलाओं ने शिक्षा और सामाजिक सुधार में सक्रिय योगदान दिया।
चतुर्भुज स्थान की सामाजिक जागरूकता
जुगनू पत्रिका और नसीमा खातून का प्रयास
जुगनू पत्रिका के माध्यम से लोगों को यह समझाया गया कि हर महिला सेक्स वर्कर नहीं होती। इनके भी विचार, पॉलिटिक्स और शिक्षा में भागीदारी है।
बेगम और महिला सशक्तिकरण की कहानी
बेगम ने राजनीति में प्रवेश किया और काउंसलर पद के लिए चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस तरह, चतुर्भुज स्थान की महिलाओं ने सामाजिक पहचान बनाई और बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाया।
निष्कर्ष: इतिहास और वर्तमान का मिश्रण
चतुर्भुज स्थान मुजफ्फरपुर का इतिहास मंदिर और भक्ति से शुरू होकर कला, संगीत और फिर समाजिक कठिनाइयों तक फैला है। यहाँ की तवाइफें और कलाकार न केवल कला और संगीत में योगदान देने वाली महिलाएं थीं, बल्कि उन्होंने समाज को चुनौती दी और बदलाव की दिशा दिखाई।
आज भी यह मोहल्ला अपने अतीत की यादें और वर्तमान की सच्चाई के मिश्रण के रूप में मौजूद है। इस जगह की कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि इतिहास और वर्तमान का संतुलन हमेशा जटिल और दिलचस्प होता है।
