महामारी के साए में लोकतंत्र की परीक्षा
2020 में जब पूरा देश कोरोना महामारी की चपेट में था, बिहार ने भारतीय लोकतंत्र की एक अनोखी मिसाल पेश की। मास्क, सैनिटाइज़र और सोशल डिस्टेंसिंग के बीच देश का पहला बड़ा चुनाव हुआ। यह सिर्फ़ सीटों का नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के 15 साल के शासन बनाम तेजस्वी यादव की नई पीढ़ी की राजनीति का जनमत-संग्राम था।
🔶 राजनीतिक परिदृश्य: थके हुए मुख्यमंत्री बनाम उभरता युवा चेहरा
2020 का चुनाव बिहार की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ था।
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नीतीश कुमार, जो “सुसाशन बाबू” की छवि से दशकों तक बिहार की राजनीति पर हावी रहे, इस बार थके हुए और जनता से कुछ हद तक कटे हुए नज़र आए।
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दूसरी ओर, तेजस्वी यादव ने बेरोजगारी, प्रवासी संकट और महँगाई जैसे जमीनी मुद्दों को अपने अभियान का केंद्र बनाया, जिससे युवा वर्ग में जबरदस्त उत्साह पैदा हुआ।
🔶 जातीय समीकरण: बदलता गणित, लेकिन पुराना प्रभाव
बिहार की राजनीति से जातीय समीकरणों को अलग नहीं किया जा सकता।
2020 में भी हर सीट पर जाति की बुनावट निर्णायक रही।
| जातीय समूह | पारंपरिक झुकाव | 2020 में बदलाव |
|---|---|---|
| यादव | राजद | मजबूती बनी रही, पर सीमित विस्तार |
| कुर्मी-कायस्थ | जेडीयू/बीजेपी | आंशिक विभाजन, बीजेपी को बढ़त |
| सवर्ण | बीजेपी | लगभग ठोस समर्थन |
| मुसलमान | महागठबंधन, एआईएमआईएम | सीमांचल में एआईएमआईएम ने सेंध लगाई |
| दलित/महादलित | नीतीश कुमार | महिला योजनाओं से स्थिर समर्थन |
यहाँ सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि बीजेपी ने जाति से ऊपर संगठन और राष्ट्रवाद की राजनीति को आगे रखकर वोट ट्रांसफर कराया, जिससे जेडीयू को नुकसान हुआ, पर गठबंधन बचा रहा।
🔶 बीजेपी-जेडीयू समीकरण: साझेदारी में तनाव
चुनाव परिणामों ने एनडीए के भीतर सत्ता का समीकरण बदल दिया —
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बीजेपी ने 74 सीटें जीतीं, जबकि
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जेडीयू सिर्फ 43 पर सिमट गई।
यह पहली बार था जब बीजेपी बिहार में ‘वरिष्ठ साझेदार’ बनकर उभरी।
नीतीश कुमार को भाजपा की कृपा से मुख्यमंत्री बनना पड़ा।
राजनीतिक दृष्टि से यह “नीतीश के नेतृत्व का पतन” और “बीजेपी के बिहार में स्थायी विस्तार” का संकेत था।
🔶 तेजस्वी यादव: विरोध से विकल्प तक
तेजस्वी यादव ने यह साबित किया कि बिहार का युवा अब “लालू युग की याद” नहीं, बल्कि “रोज़गार का वादा” चाहता है।
उनका “10 लाख नौकरियों” का वादा भले अवास्तविक लगा हो, पर यह भावनात्मक रूप से जनता से जुड़ने में सफल रहा।
महागठबंधन को सिर्फ़ 12 सीटों की कमी रही —
यह इस बात का प्रमाण था कि जनता बदलाव के लिए तैयार थी, पर स्थिरता के लिए एनडीए को चुना।
🔶 सीमांचल में एआईएमआईएम का उदय: विपक्ष की नई चुनौती
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने सीमांचल क्षेत्र में 5 सीटें जीतकर यह दिखा दिया कि मुसलमान मतदाता अब कांग्रेस या राजद का “गारंटीड वोट बैंक” नहीं रहा।
यह भविष्य में महागठबंधन की मुस्लिम-यादव (MY) राजनीति को चुनौती देने वाला कारक है।
🔶 वोट शेयर और वास्तविक जनमत
कुल वोट शेयर:
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एनडीए – 37.26%
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महागठबंधन – 37.23%
सिर्फ़ 0.03% का अंतर, लेकिन सीटों में बड़ा फर्क।
यह दिखाता है कि एनडीए की सीट बंटवारा रणनीति और बूथ प्रबंधन विपक्ष से कहीं अधिक प्रभावी थी।
🔶 जनता का संदेश: बदलाव चाहते हैं, पर अस्थिरता नहीं
बिहार की जनता ने 2020 में जो जनादेश दिया, वह पूरी तरह मिश्रित था —
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“विकास चाहिए, पर शासन स्थिर रहना चाहिए।”
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“युवा चेहरे पर भरोसा है, लेकिन व्यवस्था में अचानक बदलाव नहीं।”
यह जनता का “संतुलित जनादेश” था — न किसी एक दल के लिए पूर्ण समर्थन, न किसी के लिए पूर्ण विरोध।
🔶 निष्कर्ष: बिहार की राजनीति का अगला अध्याय
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के बाद राज्य की राजनीति तीन स्पष्ट प्रवृत्तियों में बंटी दिखी:
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बीजेपी का वैचारिक विस्तार — संगठन, हिंदुत्व और विकास के मिश्रण के साथ।
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राजद का पुनर्जीवन — युवा नेतृत्व और जमीनी मुद्दों की राजनीति के जरिए।
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नीतीश कुमार की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह — गठबंधन में बने रहते हुए भी घटती लोकप्रियता।
आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति का भविष्य इसी त्रिकोण पर टिकेगा —
बीजेपी की रणनीति, राजद की ऊर्जा, और जेडीयू की जिद।
