देहरादून | 14 दिसंबर 2025
जब शनिवार को भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून में पासिंग आउट परेड समाप्त हुई, तो 525 नव-नियुक्त अधिकारियों में एक नाम ऐसा था जिसने सिर्फ परेड ग्राउंड नहीं, बल्कि इतिहास को भी सलामी दी।
लेफ्टिनेंट सरताज सिंह — एक ऐसे सिख अधिकारी, जिनका सेना से रिश्ता कोई संयोग नहीं, बल्कि 128 साल पुरानी पारिवारिक विरासत है। वे भारतीय सेना में सेवा देने वाली पाँचवीं पीढ़ी के सदस्य बन गए हैं।
🪖 पिता की ही बटालियन में कमीशन: विरासत का दुर्लभ संयोग
लेफ्टिनेंट सरताज सिंह को 20 जाट रेजीमेंट में कमीशन मिला है — वही यूनिट, जिसमें उनके पिता ब्रिगेडियर उपिंदर पाल सिंह भी सेवा दे चुके हैं।
सेना में एक ही परिवार की पीढ़ियों का एक ही बटालियन से जुड़ना अपने आप में बेहद दुर्लभ माना जाता है।
📜 कहानी जो 1897 में शुरू हुई थी
इस सैन्य गाथा की शुरुआत होती है 1897 में, जब 36 सिख रेजीमेंट के सिपाही किरपाल सिंह ने अफगान अभियान में भाग लिया।
यहीं से उस परंपरा की नींव पड़ी, जिसमें वर्दी सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन गई।
🌍 विश्व युद्ध से लेकर कारगिल तक बहादुरी की कड़ी
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सरताज सिंह के परदादा, सूबेदार अजीत सिंह, ने द्वितीय विश्व युद्ध में 2 फील्ड रेजीमेंट के साथ लड़ाई लड़ी।
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उन्होंने बिर हकीम की ऐतिहासिक लड़ाई में असाधारण साहस दिखाया और ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंडिया जैसे दुर्लभ सम्मान से नवाजे गए।
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उनके दादा, ब्रिगेडियर हरवंत सिंह, ने 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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उनके चाचा, कर्नल हरविंदर पाल सिंह, ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान सियाचिन जैसे खतरनाक मोर्चे पर देश की रक्षा की।
👩👦 मातृ पक्ष भी किसी से कम नहीं
सरताज सिंह की मां की ओर से भी सेना की मजबूत विरासत है।
इस परिवार में कैप्टन हरभगत सिंह, कैप्टन गुरमेल सिंह (सेवानिवृत्त), कर्नल गुरसेवक सिंह (सेवानिवृत्त) और कर्नल इंदरजीत सिंह जैसे अधिकारी शामिल रहे हैं, जिन्होंने
प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, 1971 युद्ध और अन्य अभियानों में सेवा दी।
💬 IMA का संदेश: “विरासत नाम से नहीं, जिम्मेदारी से चलती है”
IMA की ओर से कहा गया:
“सरताज सिंह के लिए कमीशनिंग कोई व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी की शुरुआत है जिसे हर पीढ़ी को दोबारा साबित करना होता है। सच्चा सम्मान विरासत में नहीं मिलता, उसे अपने कर्मों से अर्जित करना पड़ता है।”
🔰 चार पीढ़ियों की कहानी: लेफ्टिनेंट हरमनमीत सिंह रीन
इस परेड में लेफ्टिनेंट हरमनमीत सिंह रीन भी कमीशन हुए — जो अपने परिवार की चौथी पीढ़ी हैं।
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उनके परदादा सिख रेजीमेंट में थे
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दादा सिग्नल्स कोर में रहे
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दादा के दो भाई 1965 युद्ध में आर्टिलरी के अफसर थे
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जिनमें से कैप्टन उजागर सिंह को सेना मेडल मिला
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उनके पिता कर्नल हरमीत सिंह, वर्तमान में मराठा लाइट इन्फैंट्री में सेवारत हैं — और हरमनमीत को भी उसी रेजीमेंट में कमीशन मिला।
🏅 पढ़ाई, खेल और अनुशासन में अव्वल
हरमनमीत ने
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बायोनेट पिन
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सिक्स-स्टार टॉर्च
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स्क्वैश में हाफ ब्लू
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टेनिस में मेरिट कार्ड
जैसे सम्मान हासिल किए।
🚸 बचपन का सपना, राष्ट्रपति की भविष्यवाणी
IMA के अनुसार हरमनमीत के जीवन के दो अहम पल रहे:
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तीन साल की उम्र में IMA के चेतवोड बिल्डिंग के सामने खड़े होकर सेना में जाने का सपना
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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मुलाकात, जिन्होंने उन्हें सैनिक बनने के लिए प्रेरित किया
⚔️ चौथी पीढ़ी के योद्धा: लेफ्टिनेंट युवराज सिंह नुग्गाल
लेफ्टिनेंट युवराज सिंह नुग्गाल भी चौथी पीढ़ी के अधिकारी बने।
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पिता: 7 मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री
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दादा: 16 ग्रेनेडियर्स
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परदादा: आज़ादी से पहले 7 जाट
IMA ने इसे “सेवा की मशाल का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा जाना” बताया।
🎖️ परेड की समीक्षा सेना प्रमुख ने की
इस पासिंग आउट परेड में:
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5 अलग-अलग कोर्स
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14 मित्र देशों के 34 विदेशी कैडेट
शामिल थे।
परेड की समीक्षा थलसेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने की।
