1. चंबल क्यों? — पावर + पैसा + प्रोजेक्ट = गठजोड़ का परम मॉडल
ग्वालियर–चंबल रीजन (भिंड, मुरैना, श्योपुर) पिछले 10–12 साल में मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा “construction-investment ज़ोन” बन गया है।
यहाँ तीन प्रकार के प्रोजेक्ट सबसे ज़्यादा आते हैं:
(1) सड़कें और पुल (PWD + MPRDC)
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हाईवे, जिला सड़कें, ग्रामीण सड़कें
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करोड़ों के maintenance contracts
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macadam, asphalt, widening, culverts
(2) नहर और सिंचाई प्रोजेक्ट (WRD)
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चंबल नहर प्रणाली
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distributaries, minors, lining projects
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water lifting structures
(3) स्कूल और सरकारी बिल्डिंग (निर्माण एजेंसी + शिक्षा विभाग)
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CM Rise Schools
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पंचायत भवन
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अस्पताल, उप-स्वास्थ्य केंद्र, आंगनवाड़ी
इन तीनों में 1 साल में हजारों करोड़ रुपये के टेंडर निकलते हैं।
जिन जिलों का बजट छोटा होता है, वहाँ भी 300–800 करोड़ के प्रोजेक्ट आसानी से बंट जाते हैं।
इतने बड़े पैसे में खेल न हो — यह संभव नहीं।
2. कागज़ पर सिस्टम कैसा है? (Official Rules)
सरकार कहती है कि टेंडर पूरी तरह ई-टेंडरिंग के ज़रिए पारदर्शी तरीके से बंटते हैं।
सिस्टम यह है:
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DPR (Project Estimate बनता है)
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Technical Sanction
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e-Tender – तीन कवर
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PQ Documents
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Technical Bid
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Financial Bid
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L1 को Work Order
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Measurement Book (MB) में एंट्री
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Running Bill और Final Payment
सुनने में यह साफ़, पारदर्शी और विज्ञान जैसा लगता है…
लेकिन असली खेल इसी सिस्टम की परतों में छुपा है।
3. ग्राउंड रियलिटी: गठजोड़ का असली मॉडल कैसे चलता है?
यह मॉडल चंबल का नहीं, पूरे भारत में आम है — बस चंबल में यह ज़्यादा गहरा और संगठित है।
MODEL: “Estimate → Tender → Execution → Billing” — हर स्टेज पर कट
3.1 Estimate Stage — घोटाले की जड़ यहीं होती है
कैसे?
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Estimates जानबूझकर inflated बनाए जाते हैं
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ऐसे items जो ज़रूरी नहीं, वो extra जोड़ दिए जाते हैं
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thickness और quantity कागज़ पर बढ़ा दी जाती है
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soil filling, bitumen, cement की मात्रा कागज़ पर बढ़ा दी जाती है
क्यों?
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आगे ठेकेदार को “profit window” चाहिए
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अफसर का हिस्सा यहीं से सेट होता है
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नेता का “funding channel” भी इसी stage से बनता है
गेमलाइन:
“DPR जितनी मोटी होगी, बाद का काम उतना आसान।”
3.2 Tender Conditions — “हमारे ठेकेदार” के हिसाब से शर्तें सेट
टेंडर डॉक्यूमेंट में कई तरह के invisible filters लगाए जाते हैं:
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बहुत बड़ा टर्नओवर अनिवार्य
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एकदम specific मशीनें, जो केवल कुछ ठेकेदारों के पास हों
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certification ऐसा जो बाकी bidders के पास rarely हो
यानी टेंडर technically “open” दिखता है,
लेकिन practically सिर्फ 3–4 ठेकेदार qualify कर सकते हैं।
इसे ही “tailor-made tendering” कहते हैं।
3.3 Cartelisation — मिलकर बोली लगाना
यह असली खेल है।
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चंबल में ठेकेदार informal groups में बंटे होते हैं
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एक टेंडर में A को जीतना है → बाकी जानबूझकर ऊँची बोली लगा देंगे
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अगले टेंडर में B की बारी
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फिर C की
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सबका काम चलता रहता है
इसे “turn-wise ठेका” का सिस्टम कहा जाता है।
3.4 Execution — ज़मीन पर सबसे बड़ा कट यहीं
कागज़ पर 100% material,
ज़मीन पर 60–70% material।
सड़क में:
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bitumen grade बदला
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thickness कम
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aggregate cheap
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lab test “manage”
नहर में:
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cement कम
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lining मोटाई आधी
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steel कम
स्कूल में:
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कम quality की ईंट
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सस्ता cement
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rod spacing बढ़ा दी
MB में सब कुछ full दिखा दिया जाता है।
जमीन पर आधा काम।
3.5 Billing & Payment — यहाँ से निकला पैसा सबसे ज़्यादा
यही वो stage है जिसे ठेकेदार “मुनाफ़े की असली मशीन” कहते हैं।
यहाँ नीचे तक कट जाता है:
1. Running Bills
MB में full quantity, जबकि जमीन पर कम काम।
अफसर साइन कर देता है → payment निकल जाता है।
2. Fake invoices
bitumen, cement, steel की invoices reusable
एक bill कई प्रोजेक्ट में चल जाती है
3. “Quality Compromise = Extra Profit”
Actual खर्च कम, कागज पर full payment।
4. हिस्सेदारी
पैसा तीन तरफ़ जाता है:
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ठेकेदार की profit
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अफसर का हिस्सा
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नेता की political chain (funding)
यही मॉडल चुनावों में पैसे के flow को बनाता है।
4. चंबल बेल्ट के नहर–रोड–स्कूल प्रोजेक्ट्स: किस स्टेज में कितना नुकसान?
यह अनुमान नहीं — बल्कि पिछले 10 साल में चंबल और MP के समान प्रोजेक्ट्स के पैटर्न पर आधारित analysis है।
4.1 Canal Projects (सिंचाई)
औसतन:
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DPR inflated: 15–25%
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execution कमी: 30–40%
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water reach failure: वास्तविक irrigated area 40–50% ही
चंबल नहर की tail-end villages तक आज भी पूरा पानी नहीं पहुँचता, जबकि निवेश हजारों करोड़।
4.2 Road Projects
सड़क प्रोजेक्ट्स में सबसे बड़ा घोटाला:
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bitumen कम
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thickness कम
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recycled material ज़्यादा
औसत नुकसान:
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material theft: 25–35%
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quality failure: 2–3 साल में सड़क टूटना
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bills inflated: 10–15%
4.3 School & Building Construction
यहाँ खेल अलग तरह का है:
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rod spacing बढ़ा दी
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substandard brick
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PCC में cement कम
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plaster cheap
एक सरकारी स्कूल के building में:
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100 रुपये में हुआ काम
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कागज़ पर 150–170 रुपये
5. सिस्टम क्यों नहीं बदलता? — राजनीति + अफसरशाही + ठेकेदार का “त्रिकोण”
1. नेता
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चुनाव का फ़ाइनेंस ठेका सिस्टम से
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अपने पसंदीदा ठेकेदारों को “सिक्योर” करते हैं
2. अफसर
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transfer/posting भी इसी funnel से
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quality control भी “manage”
3. ठेकेदार
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सिस्टम बदलने में हित नहीं
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cartel बनाकर monopoly
यह त्रिकोण इतनी गहराई में सेट है कि कोई भी outsider contractor survive नहीं कर सकता।
6. क्या चंबल में यह मुद्दा ज़्यादा बड़ा है?
हाँ — कुछ कारण हैं:
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बड़े प्रोजेक्ट लगातार आए
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स्थानीय राजनीति में muscle + money power ज़्यादा
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district administration कमजोर और influence-driven
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PWD और WRD में पोस्टिंग-politics बहुत भारी
यानी चंबल टेंडर सिस्टम “सिंपल घोटाला” नहीं, बल्कि एक well-oiled मशीनरी है।
7. आम जनता पर प्रभाव:
1. सड़क जल्दी टूटती है
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2–3 साल में patches
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monsoon में सड़क गायब
2. नहरों में पानी नहीं पहुँचता
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किसान dependent
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tail-end villages हमेशा dry
3. स्कूल आधा टेढ़ा
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building में seepage
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प्लास्टर गिरता है
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बच्चों की safety खतरे में
8. निष्कर्ष: चंबल का टेंडर सिस्टम एक “Shadow Economy” बन चुका है
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Estimate में हेराफेरी
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Tender में tailor-made conditions
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Execution में कमी
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Billing में profit
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और ऊपर तक हिस्सेदारी
यह पूरी मशीन केवल एक बात पर टिकती है:
“Public money → Private network”
जब तक यह त्रिकोण (ठेकेदार–अफसर–नेता) सक्रिय रहेगा,
चंबल की सड़क, स्कूल और नहरें कागज़ पर perfect और जमीन पर खराब दिखती रहेंगी।
